Thursday, November 22, 2012

आत्महत्या या हत्या

आत्महत्या या हत्या
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
भीड़ का क्या है, कहीं भी, किसी भी हालात को अपना निशाना बना लेती है। आज रामदीन के बँग्ले पर!
रामदीन की लाश फाँसी पर लटकी थी, नीचे टेबुल पर लिख फरफरा रही थी आत्महत्या प्रमाण पत्र
"सालभर पहले मेरी बेटी मुनिया मेरे विश्वास की धज्जियाँ उड़ाते हुये प्रेम प्रसंग में हमें छोड़ गई थी तब पुरा समाज मेरे साथ था। विपदा की घड़ी में मुझे सँभलने का हौंसला मिला पर घटना के कुछ ही दिनों बाद से अबतक लोगों की दबी जुबानको सहना मुश्किल हो गया। इसलिये खुद को दोषी मानते हुये मैं अपने आप को खत्म कर रहा हूँ"
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
बुजुर्ग दिवस
. . . . . . . .
रामदीन का बेटा एकदम सज सँवर के बाहर जाने के लिये तैयार
ज्यों ही बाईक की ओर बढ़ा
रामदीनः सुनो बेटा :-)
बेटाः क्या है? बाहर निकलते वक्त टोकना जरूरी है क्या ! :-/
रामदीन: माफ करना बेटा पर अब बुढ़ापे में पैरों ने भी जबाब दे दिया!
बेटाः फिर सोये रहिये ना, किसने रोका है
रामदीनः छाती के दर्द से परेशान हूँ बेटा, अगर अपनी बाईक से सरकारी अस्पताल तक छोड़ देते तो दवाईयाँ ल...
े लेता
बेटाः अभी जल्दबाजी में हूँ :-/ GURRR
रामदीनः कहाँ जा रहे हो :-)
बेटाः बुजुर्ग दिवस पर भाषण देने और बुजुर्गों को सम्मानित करने
रामदीनः निःशब्द

:'(

"रामदीन चोर है"

"रामदीन चोर है"
ये खबर कुछ ही दिनों में एक चाय दुकान से उड़कर पुरे शहरमें फैल गई।
रामदीन भी अब बहुत कम ही दिखाई देता था।
तरह तरह के विचार फैल रहे थे!
"शायद बेरोजगारी से तंग आकरउसने चोरी शुरू की"
"नहीं नहीं, उसके खानदान में भी कई चोर थे, ये तो खानदानी चोर है"
"अरे नहीं यार, ये तो जुआरी था पर किसी को पता न था"
यहाँ तक कि मित्र भी कटाक्षकरते थे
"रामदीन तुम वाकई मर्द हो, पुलिस की लाठी भी तुम्हें तोड़ नह...
ीं पाई"
कुछ समयांतराल पर
कुख्यात अपराधी "जग्गा" की रँगेहाथ हुई गिरफ्तारी
उसने कबुला की शहर की सारी चोरी उसी ने की
अब रामदीन सहज था
चौक चौराहे पर खुलेआम घुम रहा था
सारे विचार बदलने लगे
रामदीन अपने मित्र के पास गया और कहा
मैं पुलिस की लाठी ही नहीं बल्कि अपनों के कटाक्ष को भी सह गया
इसलिये वाकई मर्द हूँ
मित्रः निःशब्द

॥ लेडिज फर्स्ट ॥

॥ लेडिज फर्स्ट ॥
बस स्टॉप पर बस रुकते ही झटपट सारे यात्री बस पर चढ़ने लगे। रामदीन भी किसी तरह चढ़ा और चढ़ते ही ललचाई आँखों से एक खाली सीट की तरफ बढ़ने लगा। तभी एक नवयुवक हटात से आगे निकलकर सीट पर कब्जा कर लिया।
बेबस रामदीन वहीं ठिठक गया और सोचने लगा चलो इतनी ताकत तो है कि कम से कम 30-35 मिनट का सफर खड़े खड़े तय कर सकुँ। वैसे भी जब सरकार ने रिटायर कर ही दिया तो अब इन युवकों को कौन समझाए कि वरिष्ठ नागरिक को. . . . . .,
अगले स्टॉप पर एक नवयुवती सवार हुई।
युवक तुरंत खड़ा हो गया और सीट लड़की को देते हुए बोला"लेडिज फर्स्ट"

Wednesday, March 14, 2012

-: रामदीन :-
. . . . . . . . . . . . . . . . . . .
'चुप बुढ्ढे, काम के ना काज के, दुश्मन अनाज के'
रामदीन ने तुरंत अपनी आँखे झुका ली।
रामदीन का एक पैर कब्र तक पहुँच चुका था। जिन्दगी के बचे हुए कुछ लम्हों को कचोटते हुए गुजार रहा था।
आज उसने
शराब के नशे में लड़खड़ाते अपने ईकलौते बेटे से सिर्फ इतना कहा था 'बेटा संभल के चल'।
♥ डर ♥
. . . . . . . . . , . , . . . , . , . .
रामदीन ने सुबह-सुबह आदतन अखबार के पन्ने उलटते हुए आवाज लगाई, "बिटिया, चाय हो गई हो तो लाना जरा"
"बस थोड़ी देर और पापा" बिटिया ने अंदर से ही जबाब दी।
रामदीन अखबार पढ़ते हुए अचानक गंभीर हो गाया। मोटे मोटे अक्षरों में लिखे समाचार शीर्षक "15 साल के युवक ने 13 साल की छात्रा के चेहरे पे तेजाब फेँकी"
"पापा, चाय" बिटिया ने चाय टेबुल पे रखते हुए रामदीन का ध्यान बँटाया।
"पापा, आज शाम को स्कुल के बाद सीधे लाली (सहेली) के घर जाउँगी क्योंकि आज उसका जन्मदिन है और हो सकता है कि आने में थोड़ी देरी लगे" बिटिया फिर बोली।
रामदीन की निगाहें अखबार पे अटकी हुई, चाय का कप उठाते हुए बोला "नहीं बिटिया, तुम कहीं भी नहीं जाओगी"
बिटिया आश्चर्यभाव से "क्यों पापा"
रामदीन "नि:शब्द"
♥ योग्य ♥
. . . . . . . . . . . . . .
रामदीन पुरे जोश के साथ साक्षात्कार देने पहुँचा। आज उसके जीवन का महत्वपुर्ण दिन था।
. . . . . . . .
महाशय :- अंतिम सवाल, आप अपने पद पर रहते हुए कोई निजी कार्य करना पड़े तो आप क्या करेंगे।
रामदीन :- सर, पद की गरिमा के लिए निजी कार्यों के लिए कोई जगह नहीं। अत: मैं पद के दायरे में रहकर ही कार्य करूँगा।
महाशय :- वेरीगुड, आपके सभी जबाब सटीक और संतोषपुर्ण रहे।
रामदीन :- धन्यवाद
. . . . . . .
अचानक महाशय ने जेब से मोबाइल निकाली, "ओह. . . .मंत्रीजी . . . . . . .नहीं सर वो क्या है कि मोबाईल साईलेन्ट मोड में था . . . . . . . .सॉरी सर . . . . . . . .अच्छा . . . . . . .हाँ हाँ . . . . . . . . .क्या बात करते हैं सर. . . . . . . . . . हैं हैं हैं . . . . . . . . . जी बिल्कुल जी. . . . . . . . . . जी अच्छा. . . . . . . . . ओके सर"
. . . . . .
महाशय मोबाईल जेब में रखते हुए "आई एम सॉरी रामदीन, आप इस पद के लिए योग्य नहीं हैं"
♥ चँदा ♥
. . . . . . . . . . . . . . . . . . .
आज 26 जनवरी के शुभ अवसर पर विद्यालय को खुब सजाया गया था।
रामदीन यहाँ 15 वर्षों से चौकीदार था।
रामदीन भी पुरे जोश के साथ सजावट के कार्यों में लगा था। बड़े बड़े ध्वनिविस्तारक यंत्र लगे थे, जिसमे बज रहे देशभक्ति के गाने सबों के दिल में एक नयी उमंग पैदा कर रही थी।
"रामदीन" प्रधानाध्यापक ने आवाज लगाई।
"जी साब जी" रामदीन तुरंत हाजिर हुआ।
"देखो रामदीन, अब झंडोत्तोलन का समय हो गया है। तुम उन कचरों पर ध्यान रखना।" गेट की तरफ ईशारा करते हुए प्रधानाध्यापक बोले।
रामदीन ने गेट की तरफ देखा, कुछ मासुम बच्चे खड़े थे।
रामदीन गेट तक पहुँचा तो उसमें से एक बच्चा बोला "चाचा, जलेबियाँ मिलेगी ना।
रामदीन ने बच्चों से कहा "हाँ जरूर मिलेगी पर तुमलोग एकदम से बदमाशी मत करना और चुपचाप खड़ा रहना।
रामदीन वापस आकर झंडोत्तोलन में सामिल हो गया।
प्रधानाध्यापक ने झंडा फहराया, आसमान से फुल बरसने लगे, जन गण मन का गान होने लगा। रामदीन गेट की तरफ नजर दौड़ाकर देखा सभी मासुम बच्चे सीना तानकर झंडे को सलामी दे रहा था।
भारत माता की जयजयकार के साथ झंडोत्तोलन समाप्त हुआ।
मिठाईयाँ बाँटना शुरू हो गया।
रामदीन कुछ जलेबियाँ लेकर गेट की तरफ चल पड़ा कि प्रधानाध्यापक ने टोका "कहाँ जा रहे हो रामदीन।
"साब जी, बच्चे कब से खड़े हैं, जलेबी पाकर चले जाएँगे।" रामदीन ने कहा।
"इन भिखारियों के लिए नहीं मँगाई गई है मिठाईयाँ" प्राधानाध्यापक ने रौब मे आकर कहा।
"साब जी, विद्यालय के झंडोत्तोलन में मैने भी 5 रूपये का चँदा दिया है" ये कहते हुए रामदीन गेट की ओर चल पड़ा।
♥ भाई ♥
. . . . . . . . . . . . . . . . . . .
ट्रिन ट्रिन
"हेलो"
"हेलो, गोपी के पापा आप जल्दी से घर आ जाईए"
"अरे, अचानक से, और बहुत गुस्साई सी लग रही हैं आप... "
"कल पंचायत बैठ रही है इसलिए आप आज ही गाड़ी पकड़ लिजिए"
"पंचायत! क्या हुआ कुछ बताईए तो"
"फोन पे कुछ नहीं बताउँगी, आप बस जल्दी से आ जाईए अब फोन रखती हुँ"
"हेलो . . . . .हेलो . . . . . . हेलो"
रामदीन गहरे सोच में पर गया। उसके मन में तरह तरह के डरावने ख्याल आने लगे। शीघ्र ही छुट्टी लेकर गाँव की गाड़ी पकड़ ली।
. . .
पंचायत लगी हुई थी। रामदीन के पहुँचते ही रामदीन की पत्नी जोर जोर से चिल्लाने लगी "अब हमारे गोपी के पापा आ गये हैं, अब सुनाईए जो सुनाना है। हमारे गोपी के पापा भी बहुत देश विदेश घुमते रहते हैं"
मुखिया जी ने रामदीन को समझाते हुए कहा "पंचायत में सिर्फ मर्दों के साथ बातें होगी"
रामदीन ने पत्नी को अंदर जाने को कहा।
"रामदीन, तुम तो बाहर रहते हो और यहाँ का सारा काम तुम्हारा भाई ही करता है। तुम्हारा भाई जमीन का बँटवारा चाहता है और उसका कहना है कि जमीन को अपने खुन पसीना से हीरा बनाया है इसलिए उसने जमीन का 90% अपने हिस्से में माँगा है। तुम क्या कहते हो?"
रामदीन मौन तोड़ते हुए कहा" भाई ने खुद के लिए माँगा है तो कहना क्या"
"चलो भाईयों, फिर तो पंचायत की कोई जरूरत ही नहीँ" कहते हुए मुखिया जी ने पंचायत उठा ली।
रामदीन की पत्नी झल्लाते हुए "खुद के लिए. . . . . . आपके लिए कुछ सोचा क्या?"
रामदीन "आखिर भाई है"
रामदीन की पत्नी नि:शब्द
♥ बिटिया ♥
. . . . . . . . . . . . . . . . . . . .
साहुकार : रामदीन, तुमने अपनी सारी जमीन बेच दी, अपने आगे के भविष्य के लिए कुछ तो बचाकर रख लेते।
रामदीन : अपना क्या है सेठ जी, किसी तरह जिन्दगी कट जाएगी मगर अपनी बिटिया को किसी ऐरे गैरे के यहाँ तो नहीं ना ब्याह सकता!
साहुकार : हाँ, ये तो ठीक है। पुरे गाँव में इस शादी की चर्चा हो रही है। हो भी क्यों पहली बार किसी के यहाँ डॉक्टर की बारात आ रही है।
रामदीन : अच्छा अब चलता हुँ,जल्दी से ये रूपये लड़के वालों तक पहुँचाना है और बहुत सारी तैयारी भी करनी है।
. . . . . . . . .
शादी का दिन, पुरा गाँव बारातियों के स्वागत में लगी थी। छोटे छोटे बल्बों से पुरा घर जगमगा रहा था। शहनाईयों के आवाज से पुरा माहौल गुँज रहा था।
अंतत: वो शुभ घड़ी भी आ गई।
पंडीजी मंत्रोच्चारण करते हुए कहा "कन्या को मंडप में लाईए"
"जी, अभी आई" रामदीन की पत्नी कहते हुए अंदर गई।
एक मिनट, दो मिनट, आधा घंटा निकल गया।
"जल्दी किजिए जजमान, शुभ घड़ी निकलती जा रही है" पंडीजी फिर से दोहराए।
रामदीन के कान में एक महिला ने आकर धीरे से कहा " आपको श्रीमति जी ने अंदर बुलाया है"
"मैं अभी देखकर आता हुँ पंडीजी" कहते हुए रामदीन उठकर अंदर चला गया।
. . . . .
"अरे भाग्यवान, किस बात की देरी हो रही है वहाँ सबलोग... . . ." कहते कहते रामदीन अपनी पत्नी का रोआँसा चेहरा देखकर ठिठक गया।
रामदीन की पत्नी ने एक चिट्ठा रामदीन के हाथ में पकड़ा दिया।
"हमें माफ करना पापा, जबतक ये पत्र आपके हाथ में होगा तबतक मैं आपके दुनियाँ से बहुत दुर जा चुकी हुँगी।
मै जानती हुँ आप इस वक्त बहुत दुखी होगें मगर मेरे पास कोई दूसरा रास्ता भी ना था। मैं जहाँ भी रहुँगी आपके प्यार को नहीं भुल पाऊँगी मगर इस बात का दुख रहेगा कि आपने कभी भी मुझे समझने की कोशिश नहीं की। मैं अपनी एक खुशी के लिए आपको पुरी जिन्दगी दुखी नहीं देख सकती। . . . .
आपकी बिटिया"
रामदीन : नि:शब्द